"छत्तीसगढ़ विश्व मैत्री मंच का स्थापना समारोह सम्पन्न "
रायपुर,

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की छत्तीसगढ़ शाखा द्वारा स्थापना दिवस का शानदार कार्यक्रम आयोजित किया गया
मंच की मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ स्नेहलता पाठक, अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा प्रसाद थी
सर्वप्रथम संस्था की अध्यक्ष डॉ मीता अग्रवाल ने विश्व मैत्री मंच की संस्थापक संतोष श्रीवास्तव के इस संस्था के माध्यम से किए गए उल्लेखनीय कामों, उद्देश्यों और उपयोगिता पर प्रकाश डाला
उन्होंने बताया कि लेखक और साहित्यकार को पर्यटन से भी लगातारlजोड़ा जा रहा है जिससे और अधिक उपयोगी सिद्ध हो सके
मुख्य अतिथि डॉ स्नेहलता पाठक ने इस अवसर पर अपनी एक व्यंग्य कविता सुनाई
"मान्यवर आपने सही फरमाया
मैं मानव पार्टी से खड़ा हूं"
अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए श्री गिरीश पंकज ने कहा कि सदियों से ही बहुत आगे रही हैं हम ही भूल गए हैं कि गार्गी सहित तमाम महिलाएं शास्त्रार्थ में पुरुषों को हरा देती थी
स्त्री विमर्श में हम महादेवी वर्मा को केंद्र में रखकर बात करते हैं आशा पूर्णा देवी को देखिए जिन्होंने घर में रहकर भी इतने इतना श्रेष्ठ साहित्य रचा कि उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ
लेखन के क्षेत्र में एक लेखक के तौर पर ही लिखना चाहिए सिर्फ स्त्री या सिर्फ पुरुष नहीं
विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रज्ञा प्रसाद ने "बुरे वक्त का शुक्रिया"शीर्षक से अपनी सकारात्मक संदेश देने वाली कविता सुनाई

छत्तीसगढ़ इकाई की प्रथम अध्यक्ष डॉ मंजुला श्रीवास्तव को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित इस स्थापना समारोह में विभिन्न साहित्यकारों की उपस्थिति रही
"काश मैं मोबाइल होती"यह व्यंग्य रचना किरण वैद्य ने सुनाई
विद्या गुप्ता ने "सृष्टि की पहली छुअन हर रूप में पहचान हो"कविता सुनाई
मंजू सरावगी की कविता का शीर्षक था "तपती रेत" सुनीता विनय वर्मा,
कल्याणी तिवारी ने सुनाया "मेरे समीप से गुजरती हो पर मुझे ही अनदेखा कर जाती हो "
कुमार जगदलवी की पंक्तियां थी "अब तो दिखना बंद हो रहे धोती कुर्ता वाले लोग"
मन्नू लाल यदु ने छत्तीसगढ़ी गीत
सुनाया" मोर लुगरा के अचरा देहरा में परगे"
वरिष्ठ कवि दिनेश गौतम ने शांतला शीर्षक से कविता सुनाई
सुनीता विनय वर्मा ने कहा" मन की बातें मन ही जाने क्यों मन को छूते बेगाने"
डॉ मीता अग्रवाल की पंक्तियां थी"जगती ताल सुंदरता अनुपम
पंचतत्व पर आधारित
गिरिवन कानन नदियां करती
तन मन जन को श्रृंगारित"
रत्ना पाण्डेय ने "मेरा घर कहां है "शीर्षक से कविता पाठ किया
भारती अग्रवाल की पंक्तियां थी"आसान नहीं है राम का रास्ता अपनाना"
ईरा पंत ने सुनाया"न जाने कौन सा पल आखिरी हो जाए"
वृंदा पंचभाई ने सुनाया "उंगलियां हमारे शरीर का सिर्फ अंग नहीं है यह हमें सिखाती है जीवन की सीख"
शशि दुबे ने कहा "नहीं रहूंगी मैं तो क्या है मेरे सुरभित गीत रहेंगे"
सुधा शर्मा "कोयल" की पंक्तियां थी "अगर पुनर्जन्म होता है तो मैं सिर्फ परिचित स्त्री ही बनना चाहूंगी"
सीमा निगम ने कहा"देश ने देर से ही सही नारी शक्ति को पहचाना"
कंचन सहाय की पंक्तियां थी नारी सिर्फ बिहारी की नायिका नहीं"
नीलिमा मिश्रा की पंक्तियां थी" हो रहा है अवसान निशा का आ रही पूर्व से लालिमा"
चंद्रकला त्रिपाठी की कविता थी "भोर की पहली किरण जागो"
गंगा शरण पासी ने सुनाया "लोग लगे हैं गणित में कौन जीता कौन हारा"
सुषमा प्रेम पटेल ने कहा
"आसमान दृष्टि डाल बाल सूर्य लाल लाल
स्वास्थ्य में सुधार हेतु प्राण वायु पीजिए"
छबिलाल सोनी की पंक्तियां "नारी से न शोभित है सुन ले सकल जहान"
कार्यक्रम का संचालन रत्ना पांडेय ने किया और आभार प्रदर्शन वृंदा पंच भाई ने किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ के साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।
