ABVV में फर्नीचर खरीदी घोटाला: जांच समिति ने उठाए गंभीर सवाल
न्यायधानी स्थित अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों में घिर गया है। विश्वविद्यालय में फर्नीचर खरीदी से जुड़ा करीब 92.55 लाख रुपये का मामला अब बड़े घोटाले के रूप में सामने आया है। तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में खरीदी प्रक्रिया को न केवल संदेहास्पद बताया गया है, बल्कि इसमें कई स्तरों पर गंभीर अनियमितताओं और नियमों की अनदेखी का खुलासा भी हुआ है।
बाजार से तीन गुना ज्यादा कीमत पर खरीदी
जांच समिति ने पाया कि विश्वविद्यालय द्वारा खरीदी गई फर्नीचर सामग्री बाजार मूल्य से दो से तीन गुना अधिक कीमत पर ली गई। यह खरीदी 15 अप्रैल 2025 को जेम पोर्टल के माध्यम से की गई थी, जिसकी कुल लागत 92,55,116 रुपये बताई गई है। समिति ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इतने बड़े वित्तीय लेन-देन में प्रतिस्पर्धी निविदा (बिडिंग) प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
जेम पोर्टल के नियमों का उल्लंघन
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जेम पोर्टल पर एल-1 पद्धति से सीधे खरीदी की गई, जबकि इस स्तर की खरीद के लिए खुले टेंडर आमंत्रित किए जाना आवश्यक था। इससे पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा दोनों प्रभावित हुईं। जांच समिति ने इसे नियमों का उल्लंघन माना है।
समितियों की भूमिका पर भी सवाल
क्रय समिति और वित्त समिति की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। समिति ने पाया कि इन दोनों समितियों ने केवल सामग्री की मात्रा की अनुशंसा की, जबकि उन्हें मूल्य का आकलन करते हुए प्रस्ताव देना चाहिए था। यह लापरवाही या जानबूझकर की गई अनदेखी मानी जा रही है।
ये हैं विश्वविद्यालय क्रय समिति के सदस्य
डॉ. ऐलेक्जेंडर कुजूर वित्त अधिकारी, डॉ. एच.एस. होता-विभागाध्यक्ष (कम्प्यूटर साईंस एवं एप्लीकेशन), डॉ. डीएसवीजी के कलाधर विभागाध्यक्ष (माइकोबायोलॉजी एण्ड बायोइन्फार्मेटिक्स) डॉ. पूजा पाण्डेय विभागाध्यक्ष (कॉगर्स एण्ड फाइनेंशियल, स्टडीज), यशवंत पटेल विभागाध्यक्ष (फूड प्रोसेसिंग एण्ड टेक्नोलॉजी), सौमित्र तिवारी (प्रभारी भण्डार शाखा) सदस्य के रूप में नामित हैं।
कार्यपरिषद की अनुमति नहीं ली गई
विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार इतनी बड़ी राशि की खरीदी के लिए कार्यपरिषद की अनुमति अनिवार्य होती है। लेकिन जांच में यह तथ्य सामने आया कि इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया को नजरअंदाज किया गया। केवल वित्त समिति और क्रय समिति की अनुशंसा के आधार पर खरीदी कर ली गई, जो नियमों के विपरीत है।
एक ही जिले की फर्मों को मिला ठेका
जांच में यह भी उजागर हुआ कि फर्नीचर की पूरी खरीदी जांजगीर जिले के बनारी क्षेत्र की कुछ चुनिंदा फर्मों से की गई। इनमें सागर इंडस्ट्रीज, ओशन इंटरप्राइजेस और सिंघानिया ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज शामिल हैं। एक ही क्षेत्र की फर्मों को ठेका दिए जाने पर भी समिति ने संदेह जताया है।
खरीदा गया सामान बेकार पड़ा
मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि लाखों रुपये खर्च कर खरीदा गया फर्नीचर अब तक उपयोग में नहीं लाया गया है। जांच में सामने आया कि सामान को विश्वविद्यालय परिसर में डंप कर दिया गया है और उसका कोई उपयोग नहीं हो रहा। इससे सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका और मजबूत हो गई है।
वित्तीय अधिकारों पर भी सवाल
जांच रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुलपति और कुलसचिव के वित्तीय अधिकारों की सीमा से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। नियमों के अनुसार 20 हजार रुपये से अधिक की स्वीकृति के लिए स्पष्ट प्रक्रिया होती है, लेकिन इस मामले में पारदर्शिता का अभाव दिखा।
जांच समिति के सदस्य
इस पूरे मामले की जांच उच्च शिक्षा संचालनालय के तीन वरिष्ठ अधिकारियों की समिति ने की, जिसमें डॉ. किशोर कुमार तिवारी (संयोजक), डॉ. गोवर्धन यदु (सदस्य) और महेश कुमार साहू (सदस्य) शामिल रहे।
आगे क्या?
रिपोर्ट सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यह मामला न केवल वित्तीय अनियमितताओं का संकेत देता है, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की ओर भी इशारा करता है।
अब देखना होगा कि राज्य सरकार और उच्च शिक्षा विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो इसमें शामिल अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई संभव है।
यह मामला एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि शैक्षणिक संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना कितना जरूरी है।