'रेरा को खत्म कर देना चाहिए…' सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से रियल एस्टेट नियामक पर उठे सवाल

'रेरा को खत्म कर देना चाहिए…' सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से रियल एस्टेट नियामक पर उठे सवाल
 सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि रेरा अपने मूल उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहा है। कोर्ट के मुताबिक, यह संस्था अब पीड़ित घर खरीदारों के बजाय डिफॉल्टर बिल्डरों के लिए सुरक्षा कवच बनती जा रही है।

हिमाचल प्रदेश सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्यों को आत्ममंथन की सलाह दी। कोर्ट ने पूछा कि जब रेरा का गठन घर खरीदारों को राहत देने के लिए किया गया था, तो फिर वे आज भी न्याय के लिए भटक क्यों रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग-भिलाई जैसे शहरों में भी हजारों खरीदार रेरा में शिकायतें दर्ज कर चुके हैं, लेकिन आदेशों के पालन और राशि की वसूली में लंबा समय लग रहा है। कई मामलों में खरीदार वर्षों से चक्कर काट रहे हैं।

हाई कोर्ट के वकील और रेरा विशेषज्ञ अपूर्व जैन तारण का कहना है कि रेरा के पास आदेश पारित करने की शक्ति तो है, लेकिन उन्हें लागू करवाने के लिए प्रभावी तंत्र नहीं है। रिकवरी के मामलों को कलेक्टर कार्यालय भेजा जाता है, जहां वे अक्सर लंबित रह जाते हैं। बिल्डरों पर सख्ती के लिए एक मजबूत व्यवस्था विकसित नहीं हो पाई है।

जानकारों का कहना है कि कानून की धारा 8 के तहत प्रोजेक्ट पूरा कराने का अधिकार रेरा को है, लेकिन जांच और निगरानी के लिए पर्याप्त स्टाफ की कमी है। इसके अलावा, अलग-अलग राज्यों ने अपने नियम बनाकर कानून की एकरूपता को भी प्रभावित किया है।

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद अब केंद्र और राज्य सरकारों पर रेरा कानून में संशोधन का दबाव बढ़ सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेरा को सिविल कोर्ट जैसी कुर्की और गिरफ्तारी के सीधे अधिकार दिए जाएं, तो घर खरीदारों को समयबद्ध और प्रभावी राहत मिल सकती है।